अंतरावस्था: G₁ प्रावस्था: कोशिका बढ़ रही है, प्रोटीन और कोशिकांग बना रही है। हर गुणसूत्र क्रोमैटिन के लंबे ढीले धागे की तरह केंद्रक में फैला है, जिसमें एक ही क्रोमैटिड है।
समजात जोड़ा 1समजात जोड़ा 2तर्कु तंतुएक ही रंग का गहरा और हल्का गुणसूत्र एक समजात जोड़ा हैनियंत्रण
किसी भी अवस्था पर जाएँ
गुणसूत्र संख्या
कोशिका का प्रकार
मापन
- वर्तमान अवस्था
- अंतरावस्था: G₁ प्रावस्था
- गुणसूत्र (सेंट्रोमियर गिनकर)
- 4
- क्रोमैटिड
- 4
- DNA की मात्रा
- 2C
- प्रगति
- 0%
सिमुलेशन का उपयोग कैसे करें
- ▶ दबाने पर कोशिका अपने आप पूरा चक्र चलाएगी: अंतरावस्था, पूर्वावस्था, प्राक्-मध्यावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था और कोशिकाद्रव्य विभाजन।
- “पिछली अवस्था” और “अगली अवस्था” बटन से एक-एक अवस्था आगे-पीछे जाएँ; हर बार एनिमेशन रुक जाएगा ताकि आप ठीक से देख सकें।
- समयरेखा का स्लाइडर खींचकर किसी भी क्षण पर जाएँ। नीचे लिखा रहेगा कि उस समय क्या हो रहा है।
- गुणसूत्र संख्या 2n = 4 से 6 करें: एक ही रंग का गहरा और हल्का गुणसूत्र एक समजात जोड़ा है।
- कोशिका का प्रकार बदलकर पादप कोशिका देखें: उसमें तारककेंद्र नहीं होते, और अंत में खाँच की जगह बीच में कोशिका पट्टिका बनती है।
- मापन पैनल में हर अवस्था के गुणसूत्र, क्रोमैटिड और DNA के मान कॉपी में लिखें और नीचे की तालिका से मिलाएँ।
एक कोशिका से खरबों कोशिकाएँ: कैसे?
आपका जीवन सिर्फ़ एक कोशिका से शुरू हुआ था, जिसे युग्मनज (ज़ाइगोट) कहते हैं। आज आपके शरीर में खरबों कोशिकाएँ हैं। ये सब आईं कहाँ से? जवाब सीधा है: एक कोशिका टूटकर दो, दो से चार, चार से आठ। टूटकर बँटने की यही प्रक्रिया कोशिका विभाजन है।
उँगली कट जाए तो कुछ ही दिनों में घाव भर जाता है। नई त्वचा कौन बनाता है? घाव के आसपास की कोशिकाएँ बार-बार विभाजित होकर खाली जगह भर देती हैं। बाल बढ़ते हैं, नाखून लंबे होते हैं, पौधे की जड़ मिट्टी में गहरी जाती है: हर जगह यही काम चल रहा है।
पर इसमें एक बड़ी शर्त है। नई कोशिका को ठीक वही जानकारी मिलनी चाहिए जो जनक कोशिका में थी। त्वचा की कोशिका से त्वचा की कोशिका ही बने, और हर कोशिका में सही संख्या में गुणसूत्र हों। इतनी सटीक बँटवारे वाली प्रक्रिया ही समसूत्री विभाजन है। कोशिका पहले अपने पूरे DNA की प्रति बनाती है, फिर एक-एक पूरी प्रति दोनों ओर भेज देती है।
किताब में इसका एक स्थिर चित्र होता है जिसे हम रट लेते हैं। पर समसूत्री विभाजन असल में एक नाच है: गुणसूत्र जोड़ी बनाकर बीच में खड़े होते हैं, फिर अचानक दोनों ओर भाग जाते हैं। ऊपर का एनिमेशन वही नाच दिखाता है। चलिए इसे चरण-दर-चरण समझें।
कोशिका विभाजन किसे कहते हैं और इसके प्रकार
वह प्रक्रिया जिसमें एक जीवित कोशिका विभाजित होकर दो या अधिक संतति कोशिकाएँ बनाती है, कोशिका विभाजन कहलाती है। विभाजित होने वाली कोशिका को जनक (मातृ) कोशिका और बनने वाली कोशिकाओं को संतति कोशिकाएँ कहते हैं।
1855 में रुडोल्फ विरचो ने कहा कि हर कोशिका पहले से मौजूद किसी कोशिका से ही बनती है। 1882 में जर्मन वैज्ञानिक वाल्थर फ्लेमिंग ने सैलामैंडर की कोशिकाओं में विभाजन देखकर इसे माइटोसिस नाम दिया। ग्रीक शब्द माइटोस का अर्थ है धागा, क्योंकि विभाजन की शुरुआत में गुणसूत्र धागे जैसे दिखते हैं।
जीव कोशिकाओं में तीन तरह का विभाजन होता है। “कोशिका विभाजन के प्रकार” प्रश्न का उत्तर यही है:
- असूत्री विभाजन (एमाइटोसिस, प्रत्यक्ष विभाजन): केंद्रक बीच से सीधे दबकर दो भागों में बँट जाता है, फिर कोशिकाद्रव्य बँटता है। कोई तर्कु नहीं बनता, गुणसूत्र अलग से नहीं दिखते। अमीबा, यीस्ट जैसे सरल एककोशिकीय जीवों में ऐसा विभाजन देखा जाता है।
- समसूत्री विभाजन (माइटोसिस): केंद्रक एक बार बँटता है और संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या जनक के बराबर रहती है। यह कायिक (शरीर की) कोशिकाओं में होता है।
- अर्धसूत्री विभाजन (मिओसिस): केंद्रक लगातार दो बार बँटता है, पर गुणसूत्रों की प्रतिकृति एक ही बार होती है। इससे चार संतति कोशिकाएँ बनती हैं, हर एक में गुणसूत्र संख्या आधी। युग्मक बनाते समय जनन मातृ कोशिकाओं में यह होता है।
| लक्षण | असूत्री | समसूत्री | अर्धसूत्री |
|---|---|---|---|
| केंद्रक कितनी बार बँटता है | एक बार, सीधे | एक बार | दो बार |
| तर्कु बनता है? | नहीं | हाँ | हाँ |
| संतति कोशिकाएँ | 2 | 2 | 4 |
| गुणसूत्र संख्या | नियंत्रित नहीं | जनक के बराबर (2n → 2n) | आधी (2n → n) |
| कहाँ होता है | सरल एककोशिकीय जीव | कायिक कोशिकाएँ, विभज्योतक | जनन मातृ कोशिकाएँ |
कोशिका चक्र: विभाजन से पहले की लंबी तैयारी
एक कोशिका के बनने से लेकर उसके विभाजित होकर दो कोशिकाएँ बनाने तक की घटनाओं का क्रम कोशिका चक्र कहलाता है। इसके दो मुख्य भाग हैं: अंतरावस्था और M प्रावस्था (सूत्री विभाजन प्रावस्था)। मज़े की बात यह है कि कोशिका अपना ज़्यादातर समय अंतरावस्था में बिताती है। संवर्धन में रखी मानव कोशिकाओं का पूरा चक्र लगभग 24 घंटे का होता है, जबकि असली विभाजन सिर्फ़ लगभग एक घंटा चलता है।
पहले अंतरावस्था को “विश्राम अवस्था” कहा जाता था, क्योंकि सूक्ष्मदर्शी में तब गुणसूत्र नहीं दिखते। पर यह बिल्कुल आराम का समय नहीं है। परीक्षा से पहले वाली रात की तरह, इसी समय कोशिका सबसे व्यस्त रहती है। अंतरावस्था की तीन उपअवस्थाएँ हैं:
G₁ प्रावस्था (पहली वृद्धि प्रावस्था)
नई बनी कोशिका आकार में बढ़ती है, प्रोटीन, RNA और कोशिकांग बनाती है। इस समय हर गुणसूत्र में एक ही क्रोमैटिड होता है, और DNA की मात्रा को हम 2C मानते हैं। एनिमेशन की शुरुआत में लंबे पतले धागे देखिए, हर एक अकेला है।
S प्रावस्था (संश्लेषण प्रावस्था)
S यानी synthesis। इसी प्रावस्था में DNA प्रतिकृतियन होता है: हर DNA अणु अपनी हूबहू प्रति बनाता है। अब हर गुणसूत्र में दो एक जैसे सिस्टर क्रोमैटिड होते हैं, जो सेंट्रोमियर पर जुड़े रहते हैं। DNA दोगुना होकर 2C से 4C हो जाता है, पर गुणसूत्र संख्या नहीं बदलती, क्योंकि सेंट्रोमियर अभी भी एक ही है।
G₂ प्रावस्था (दूसरी वृद्धि प्रावस्था)
कोशिका विभाजन के लिए ज़रूरी प्रोटीन (जैसे तर्कु के लिए ट्यूबुलिन) बनाती है और ऊर्जा जमा करती है। जंतु कोशिका में तारककेंद्र का जोड़ा भी दो जोड़े बन जाता है। एनिमेशन में केंद्रक के ऊपर नारंगी छोटी छड़ें दो जोड़ों में बँटती दिखेंगी।
G₀ प्रावस्था: जो विभाजित नहीं होतीं
कुछ कोशिकाएँ G₁ से निकलकर एक शांत, अविभाजी अवस्था में चली जाती हैं, जिसे G₀ कहते हैं। ज़्यादातर तंत्रिका कोशिकाएँ और हृदय पेशी कोशिकाएँ इसी अवस्था में रहती हैं, इसलिए नष्ट होने पर इनकी जगह आसानी से नई कोशिकाएँ नहीं बनतीं। वहीं यकृत की कोशिकाएँ ज़रूरत पड़ने पर G₀ से लौटकर विभाजित हो सकती हैं।
समसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ विस्तार से
समसूत्री विभाजन को दो भागों में पढ़ा जाता है। पहले केंद्रक का विभाजन, जिसे केंद्रक विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं; फिर कोशिकाद्रव्य का विभाजन, जिसे कोशिकाद्रव्य विभाजन (साइटोकाइनेसिस) कहते हैं। NCERT केंद्रक विभाजन की चार अवस्थाएँ बताती है: पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था और अंत्यावस्था; कई किताबें पूर्वावस्था और मध्यावस्था के बीच प्राक्-मध्यावस्था को अलग गिनती हैं। अवस्थाएँ असल में एक-दूसरे में घुलकर चलती हैं, समझने के लिए हम इन्हें अलग करते हैं। हर अवस्था पढ़ते समय ऊपर का एनिमेशन उसी अवस्था पर रोककर मिलाइए।
1. पूर्वावस्था (प्रोफेज़): गुणसूत्र दिखने लगते हैं
यह समसूत्री विभाजन की सबसे लंबी अवस्था है। केंद्रक के अंदर क्रोमैटिन के लंबे धागे कसकर कुंडलित होते हैं, जिससे गुणसूत्र छोटे और मोटे होकर सूक्ष्मदर्शी में दिखने लगते हैं। हर गुणसूत्र के दो सिस्टर क्रोमैटिड साफ़ दिखते हैं, जो सेंट्रोमियर पर जुड़े हैं।
केंद्रिका धीरे-धीरे गायब हो जाती है। जंतु कोशिका में तारककेंद्र के दोनों जोड़े कोशिका के विपरीत ध्रुवों की ओर चले जाते हैं, और उनके चारों ओर तारे जैसी किरणें (एस्टर) बनती हैं। ध्रुवों के बीच सूक्ष्मनलिकाओं के महीन तंतुओं से तर्कु (स्पिंडल) बनने लगता है।
2. प्राक्-मध्यावस्था: आवरण टूटता है, तंतु जुड़ते हैं
केंद्रक आवरण टुकड़ों में टूट जाता है, इसलिए गुणसूत्र अब सीधे कोशिकाद्रव्य में आ जाते हैं। तर्कु तंतु हर सेंट्रोमियर पर मौजूद काइनेटोकोर नामक संरचना से जुड़ जाते हैं। एक गुणसूत्र के दोनों सिस्टर क्रोमैटिड विपरीत ध्रुवों के तंतुओं से जुड़ते हैं, और इस खींचतान से गुणसूत्र कोशिका के बीच की ओर खिसकते हैं।
3. मध्यावस्था (मेटाफेज़): बीच में एक कतार
सभी सेंट्रोमियर कोशिका के ठीक बीच में, मध्यावस्था पट्टिका (मध्यरेखीय पट्टिका) पर एक कतार में आ जाते हैं। दोनों ध्रुवों का खिंचाव बराबर होता है, इसलिए गुणसूत्र स्थिर रहते हैं। इस समय गुणसूत्र सबसे ज़्यादा संघनित और साफ़ होते हैं, इसीलिए गुणसूत्रों को गिनने और उनकी आकृति देखने के लिए मध्यावस्था सबसे अच्छी है। कैरियोटाइप बनाने के लिए वैज्ञानिक कोशिकाओं को ठीक इसी अवस्था में रोकते हैं।
4. पश्चावस्था (एनाफेज़): ध्रुवों की ओर दौड़
हर सेंट्रोमियर दो भागों में बँट जाता है। सिस्टर क्रोमैटिड अलग हो जाते हैं, और इसी क्षण से हर एक को स्वतंत्र संतति गुणसूत्र कहा जाता है। तर्कु तंतु छोटे होते जाते हैं और संतति गुणसूत्रों को विपरीत ध्रुवों की ओर खींच लेते हैं।
चलते समय सेंट्रोमियर आगे रहता है और दोनों भुजाएँ पीछे लटकती हैं, इसलिए गुणसूत्र V, J या I आकार के दिखते हैं। एनिमेशन में देखिए, हर क्रोमैटिड नुकीले सिरे से अपने ध्रुव की ओर जा रहा है। पश्चावस्था समसूत्री विभाजन की सबसे छोटी अवस्था है।
5. अंत्यावस्था (टीलोफेज़): दो नए केंद्रक
संतति गुणसूत्र ध्रुवों पर पहुँच जाते हैं और अब पूर्वावस्था उल्टी चलती है: गुणसूत्र खुलकर फिर लंबे क्रोमैटिन धागे बन जाते हैं, हर ध्रुव पर नया केंद्रक आवरण और केंद्रिका बनती है, और तर्कु गायब हो जाता है। अब एक कोशिका में दो केंद्रक हैं, और केंद्रक विभाजन पूरा हो गया।
6. कोशिकाद्रव्य विभाजन: कोशिका दो भागों में
जंतु कोशिका में बीच की झिल्ली में एक विदलन खाँच बनती है, जो बाहर से अंदर की ओर गहरी होती जाती है और अंत में कोशिका को दो भागों में बाँट देती है। पादप कोशिका की कठोर भित्ति को इस तरह दबाया नहीं जा सकता, इसलिए बीच में गॉल्जी काय की पुटिकाएँ जमा होकर कोशिका पट्टिका बनाती हैं, जो बीच से बाहर की ओर बढ़कर दोनों ओर की भित्तियों से मिल जाती है।
परिणाम: एक जनक कोशिका से दो संतति कोशिकाएँ, जिनकी गुणसूत्र संख्या और आनुवंशिक जानकारी हूबहू जनक जैसी है।
गुणसूत्र और क्रोमैटिड गिनने का नियम
समसूत्री विभाजन के प्रश्नों में सबसे ज़्यादा गलतियाँ गिनती में होती हैं। नियम एक ही है: गुणसूत्र सेंट्रोमियर गिनकर गिनें। जितने सेंट्रोमियर, उतने गुणसूत्र। दो क्रोमैटिड वाला गुणसूत्र भी एक ही गुणसूत्र है, क्योंकि उसमें सेंट्रोमियर एक है।
नीचे की तालिका एनिमेशन के अपने मान 2n = 4 से गणना की गई है। एनिमेशन चलाकर मापन पैनल के मान इस तालिका से मिलाइए।
गुणसूत्र संख्या = सेंट्रोमियर संख्याहर अवस्था में यही नियम
S प्रावस्था के बाद: क्रोमैटिड = 2 × गुणसूत्रपश्चावस्था तक
पश्चावस्था में: गुणसूत्र = क्रोमैटिड = 4nपूरी कोशिका में, सेंट्रोमियर बँटने के बाद
| अवस्था | गुणसूत्र | क्रोमैटिड | DNA |
|---|---|---|---|
| G₁ प्रावस्था | 4 | 4 | 2C |
| G₂ प्रावस्था | 4 | 8 | 4C |
| पूर्वावस्था | 4 | 8 | 4C |
| मध्यावस्था | 4 | 8 | 4C |
| पश्चावस्था | 8 | 8 | 4C |
| अंत्यावस्था (पूरी कोशिका) | 8 | 8 | 4C |
| प्रत्येक संतति कोशिका | 4 | 4 | 2C |
मानव कोशिका में वही गिनती (2n = 46)
मानव की कायिक कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं, यानी 23 जोड़े। वही नियम लगाकर हर अवस्था की गिनती नीचे है। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है “मानव कोशिका की मध्यावस्था में कितने क्रोमैटिड होते हैं?” उत्तर 92, पर गुणसूत्र तब भी 46 ही हैं।
| अवस्था | गुणसूत्र | क्रोमैटिड | DNA |
|---|---|---|---|
| G₁ प्रावस्था | 46 | 46 | 2C |
| G₂ प्रावस्था | 46 | 92 | 4C |
| पूर्वावस्था | 46 | 92 | 4C |
| मध्यावस्था | 46 | 92 | 4C |
| पश्चावस्था | 92 | 92 | 4C |
| अंत्यावस्था (पूरी कोशिका) | 92 | 92 | 4C |
| प्रत्येक संतति कोशिका | 46 | 46 | 2C |
पादप और जंतु कोशिका के समसूत्री विभाजन में अंतर
मुख्य अवस्थाएँ वही हैं, पर पादप कोशिका की कठोर भित्ति और तारककेंद्र न होने से कुछ अंतर आते हैं। एनिमेशन में कोशिका का प्रकार बदलकर इन्हें खुद देखिए।
| लक्षण | जंतु कोशिका | पादप कोशिका |
|---|---|---|
| तारककेंद्र (सेंट्रिओल) | होते हैं, ध्रुवों पर जाते हैं | सामान्यतः नहीं होते |
| एस्टर किरणें | बनती हैं (एस्ट्रल तर्कु) | नहीं बनतीं (एनेस्ट्रल तर्कु) |
| कोशिकाद्रव्य विभाजन | विदलन खाँच से, बाहर से अंदर | कोशिका पट्टिका से, बीच से बाहर |
| सबसे ज़्यादा कहाँ | लगभग सभी कायिक कोशिकाएँ | विभज्योतक: जड़ और तने के शीर्ष, एधा (कैम्बियम) |
समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन में अंतर
यह तुलना कक्षा 11, CBSE बोर्ड और NEET, तीनों में लगभग पक्का प्रश्न है। तालिका समझकर पढ़ेंगे तो रटना नहीं पड़ेगा।
| लक्षण | समसूत्री विभाजन | अर्धसूत्री विभाजन |
|---|---|---|
| कहाँ होता है | कायिक कोशिकाओं में | जनन मातृ कोशिकाओं में |
| केंद्रक कितनी बार बँटता है | एक बार | दो बार (अर्धसूत्री I और II) |
| संतति कोशिकाएँ | 2 | 4 |
| गुणसूत्र संख्या | अपरिवर्तित (2n → 2n) | आधी (2n → n) |
| समजात गुणसूत्रों का युग्मन | नहीं | हाँ (सूत्रयुग्मन) |
| जीन विनिमय (क्रॉसिंग ओवर) | नहीं | हाँ, नई विविधता आती है |
| संतति जनक जैसी? | हाँ, आनुवंशिक रूप से समान | नहीं |
| कार्य | वृद्धि, मरम्मत, अलैंगिक जनन | युग्मक बनाना, पीढ़ियों में गुणसूत्र संख्या स्थिर रखना |
समसूत्री विभाजन का महत्व
समसूत्री विभाजन न हो तो बहुकोशिकीय जीवन संभव ही नहीं। “समसूत्री विभाजन का महत्व लिखिए” प्रश्न में यही बिंदु लिखें:
- वृद्धि: युग्मनज से पूरा शरीर बार-बार के समसूत्री विभाजन से बनता है। पौधे की लंबाई और मोटाई विभज्योतक के समसूत्री विभाजन से बढ़ती है।
- मरम्मत और घाव भरना: रोज़ त्वचा, आंत की परत और रक्त की लाखों कोशिकाएँ मरती हैं, और समसूत्री विभाजन उनकी जगह भरता है।
- गुणसूत्र संख्या स्थिर रखना: हर कायिक कोशिका में वही गुणसूत्र और वही जीन होते हैं, इसलिए सभी कोशिकाएँ एक ही निर्देश मानती हैं।
- अलैंगिक और कायिक जनन: अमीबा और यीस्ट से लेकर कलम, रोपण और ऊतक संवर्धन तक, सब समसूत्री विभाजन पर निर्भर हैं।
- केंद्रक और कोशिकाद्रव्य का संतुलन: बहुत बड़ी हो गई कोशिका को एक केंद्रक ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता; विभाजन संतुलन लौटा देता है।
सिमुलेशन में खुद करके देखें
पढ़ने से ज़्यादा खुद देखना याद रहता है। ये पाँच छोटे प्रयोग कीजिए:
- S प्रावस्था में रोकें: हर धागे के बगल में एक हल्की प्रति बनती दिखेगी। गुणसूत्र संख्या वही रहती है, पर क्रोमैटिड दोगुने हो जाते हैं।
- पूर्वावस्था की शुरुआत और अंत की तुलना करें: वही गुणसूत्र लंबे धागे से छोटी मोटी छड़ बन गया, और केंद्रक आवरण डैश रेखा बनकर टूटने लगा।
- मध्यावस्था पर रोककर सेंट्रोमियर के काले बिंदु गिनें। 2n = 6 करने पर छह बिंदु और बारह क्रोमैटिड मिलेंगे।
- पश्चावस्था की ठीक शुरुआत पर रोकें और एक कदम आगे बढ़ें: सेंट्रोमियर बँटते ही गुणसूत्र संख्या दोगुनी हो जाती है।
- पादप कोशिका चुनकर कोशिकाद्रव्य विभाजन देखें: कोई खाँच नहीं, बीच से कोशिका पट्टिका ऊपर-नीचे बढ़ रही है।
हल किए गए प्रश्न, चरण-दर-चरण
समसूत्री विभाजन पर गणना वाले प्रश्न CBSE, NEET और राज्य बोर्ड, सब में आते हैं। इन्हें अपनी कॉपी में खुद हल करके देखें।
प्रश्न 1: n विभाजनों के बाद कितनी कोशिकाएँ?
हर समसूत्री विभाजन में एक कोशिका से दो बनती हैं, यानी संख्या हर बार दोगुनी होती है। n विभाजनों के बाद कोशिकाएँ = 2ⁿ। एक कोशिका 5 बार विभाजित हो तो 2^5 = 32 कोशिकाएँ; 10 बार हो तो 1,024।
शुरुआत में 3 कोशिकाएँ हों और हर एक 4 बार विभाजित हो, तो कोशिकाएँ = 3 × 2^4 = 3 × 16 = 48।
N = N₀ × 2ⁿN₀ = शुरुआती कोशिकाएँ, n = विभाजनों की संख्या
प्रश्न 2: दस लाख कोशिकाओं के लिए कितने विभाजन?
एक कोशिका से कम से कम 10,00,000 कोशिकाएँ पाने के लिए कितने विभाजन चाहिए? 2^19 = 5,24,288, अभी कम है। 2^20 = 10,48,576, लक्ष्य पार। इसलिए कम से कम 20 विभाजन चाहिए। लगभग बीस कदमों में दस लाख, दोगुना होने की ताक़त ऐसी ही है।
प्रश्न 3: प्याज़ की कोशिका में गुणसूत्र गिनना
प्याज़ की जड़ की कोशिका में 2n = 16। मध्यावस्था में गुणसूत्र 16 (सेंट्रोमियर 16) और क्रोमैटिड 32। पश्चावस्था में सेंट्रोमियर बँट जाते हैं, इसलिए पूरी कोशिका में गुणसूत्र 32 और क्रोमैटिड भी 32। कोशिकाद्रव्य विभाजन के बाद हर संतति कोशिका में फिर 16 गुणसूत्र।
प्रश्न 4: फल मक्खी की कोशिका
फल मक्खी ड्रोसोफिला की कायिक कोशिका में 2n = 8। G₂ में गुणसूत्र 8 और क्रोमैटिड 16। पश्चावस्था में गुणसूत्र 16। प्रश्न में “कितने क्रोमैटिड” और “कितने गुणसूत्र” को दो अलग प्रश्न मानकर पढ़ें।
प्रश्न 5: चक्र के किस भाग में कितना समय
मान लीजिए कोशिका चक्र 24 घंटे का है और उसका 95% अंतरावस्था है। अंतरावस्था = 24 × 95/100 = 22.8 घंटे। M प्रावस्था बाकी 5%, यानी 1.2 घंटे या 72 मिनट।
अगर M प्रावस्था का 40% पूर्वावस्था में जाए, तो पूर्वावस्था = 72 × 40/100 = 28.8 मिनट। इसीलिए स्लाइड पर ज़्यादातर कोशिकाएँ अंतरावस्था में दिखती हैं, और विभाजित हो रही कोशिकाओं में पूर्वावस्था सबसे ज़्यादा।
प्रश्न 6: समसूत्री सूचकांक (माइटोटिक इंडेक्स)
प्याज़ की जड़ के शीर्ष की एक स्लाइड पर 480 कोशिकाएँ गिनी गईं, जिनमें 36 विभाजित हो रही थीं। समसूत्री सूचकांक = विभाजित कोशिकाएँ ÷ कुल कोशिकाएँ × 100 = 36 ÷ 480 × 100 = 7.5%।
अगर कोशिका चक्र 20 घंटे का है, तो समसूत्री विभाजन में लगभग समय = 20 × 7.5/100 = 1.5 घंटे, यानी लगभग 90 मिनट।
समसूत्री सूचकांक = (विभाजित कोशिकाएँ ÷ कुल कोशिकाएँ) × 100
प्रश्न 7: DNA की मात्रा
किसी कोशिका में G₁ में DNA 6 पिकोग्राम है। S प्रावस्था के बाद (G₂, पूर्वावस्था, मध्यावस्था) DNA 12 pg होगा। पश्चावस्था और अंत्यावस्था में भी पूरी कोशिका में 12 pg, क्योंकि कोशिका अभी बँटी नहीं। कोशिकाद्रव्य विभाजन के बाद हर संतति कोशिका में फिर 6 pg।
प्रयोग: प्याज़ की जड़ के शीर्ष में समसूत्री विभाजन देखना
यह स्कूल और कॉलेज का जाना-पहचाना प्रयोग है। प्याज़ की जड़ का शीर्ष एक विभज्योतक है, जहाँ कोशिकाएँ लगातार बँटती रहती हैं, इसलिए एक ही स्लाइड में समसूत्री विभाजन की सभी अवस्थाएँ मिल जाती हैं।
- एक प्याज़ को पानी भरे गिलास के मुँह पर कुछ दिन रखें, नीचे सफ़ेद जड़ें निकल आएँगी।
- जड़ के बिल्कुल सिरे का 1–2 मिलीमीटर भाग काटें, क्योंकि विभाजन वहीं सबसे ज़्यादा होता है।
- सिरे को थोड़ी देर तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में रखें, ताकि कोशिकाएँ ढीली हो जाएँ।
- एसीटोकार्मिन या एसीटो-ऑर्सीन से अभिरंजित करें, गुणसूत्र गहरा रंग ले लेंगे।
- स्लाइड पर रखकर कवर स्लिप लगाएँ और हल्का दबाएँ (स्क्वैश), फिर सूक्ष्मदर्शी में देखें।
- अंतरावस्था, पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था और अंत्यावस्था वाली कोशिकाएँ ढूँढें, उनका चित्र बनाएँ और गिनकर समसूत्री सूचकांक निकालें।
वे गलतियाँ जो लगभग सभी करते हैं
इनसे बचें तो समसूत्री विभाजन के प्रश्नों में पूरे अंक पाना आसान है।
- S प्रावस्था में गुणसूत्र दोगुने होते हैं, यह गलत है। दोगुने होते हैं DNA और क्रोमैटिड; सेंट्रोमियर एक ही रहता है, इसलिए गुणसूत्र संख्या वही रहती है।
- मध्यावस्था में 4n गुणसूत्र लिखना गलत है। मध्यावस्था में गुणसूत्र 2n और क्रोमैटिड 4n; गुणसूत्र संख्या पश्चावस्था में दोगुनी होती है।
- अंतरावस्था को विश्राम अवस्था मानकर सोचना कि इसमें कुछ नहीं होता; यह सबसे व्यस्त अवस्था है और DNA प्रतिकृतियन इसी में होता है।
- यह कहना कि समसूत्री विभाजन केवल द्विगुणित कोशिकाओं में होता है; कुछ अगुणित कोशिकाएँ भी समसूत्री विभाजन से बँटती हैं।
- मध्यावस्था के चित्र में गुणसूत्र बिखरे बनाना; सेंट्रोमियर बीच की एक सीधी रेखा पर ही होने चाहिए।
- पादप कोशिका में भी खाँच से कोशिकाद्रव्य विभाजन दिखाना; पौधों में कोशिका पट्टिका बनती है।
असल ज़िंदगी में समसूत्री विभाजन
कैंसर असल में नियंत्रण खो चुका समसूत्री विभाजन है। सामान्य कोशिका जानती है कि कब रुकना है, पर कुछ जीनों में बदलाव होने पर कोशिका रुकने का संकेत नहीं मानती और लगातार बँटकर ट्यूमर बना देती है। इसलिए कैंसर की कई दवाएँ तर्कु बनने या DNA प्रतिकृतियन को रोककर तेज़ी से बँटती कोशिकाओं को रोकती हैं। इसी कारण कीमोथेरेपी में बाल झड़ते हैं, क्योंकि बालों की जड़ की कोशिकाएँ भी तेज़ी से बँटती हैं।
कॉल्चिसिन नामक रसायन तर्कु बनने नहीं देता, जिससे कोशिकाएँ मध्यावस्था में अटक जाती हैं। वैज्ञानिक इसी तरह मध्यावस्था के गुणसूत्रों का चित्र लेकर कैरियोटाइप बनाते हैं, जिससे डाउन सिंड्रोम जैसे गुणसूत्री विकार पहचाने जाते हैं।
ऊतक संवर्धन में पौधे के एक छोटे टुकड़े से हज़ारों एक जैसे पौधे तैयार होते हैं, क्योंकि समसूत्री विभाजन से बनी कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से एक जैसी होती हैं। केला, आलू और ऑर्किड के पौधे इसी तरह बनते हैं। स्टेम कोशिका अनुसंधान और जले हुए मरीज़ों के लिए त्वचा उगाना भी समसूत्री विभाजन पर टिका है।
परीक्षा कोना: CBSE और NEET
NCERT कक्षा 11 जीव विज्ञान के अध्याय “कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन” से CBSE बोर्ड में चित्र वाले प्रश्न, अवस्थाओं की विशेषताएँ और समसूत्री-अर्धसूत्री अंतर पूछे जाते हैं। NEET में सीधे तथ्य आते हैं: कौन-सी अवस्था सबसे लंबी या सबसे छोटी है, किस अवस्था में गुणसूत्र गिने जाते हैं, और किसी अवस्था में DNA या क्रोमैटिड की मात्रा कितनी है।
- परिभाषाएँ: समसूत्री विभाजन, केंद्रक विभाजन, कोशिकाद्रव्य विभाजन, काइनेटोकोर, कोशिका चक्र, समसूत्री सूचकांक।
- कारण बताइए: समसूत्री विभाजन को समीकरणीय विभाजन क्यों कहते हैं? गुणसूत्र गिनने के लिए मध्यावस्था सबसे अच्छी क्यों है? अंतरावस्था को विश्राम अवस्था कहना उचित क्यों नहीं?
- अनुप्रयोग: चित्र वाली कोशिका में गुणसूत्र और क्रोमैटिड की संख्या बताइए; दिए गए विभाजनों के बाद कोशिकाओं की संख्या निकालिए।
- NEET के लिए: 2n = 16 वाले जीव की G₂ में DNA 4C और गुणसूत्र 16, पश्चावस्था में गुणसूत्र 32; इस तरह का हिसाब जल्दी करने का अभ्यास करें।
- मध्यावस्था और पश्चावस्था के चित्र में तर्कु तंतु, सेंट्रोमियर और ध्रुव हमेशा नामांकित करें।
एक नज़र में दोहराव
परीक्षा से पहले की रात सिर्फ़ यह भाग पढ़ें, मुख्य बातें याद आ जाएँगी।
- समसूत्री विभाजन = समीकरणीय विभाजन: 1 जनक कोशिका → 2 हूबहू संतति कोशिकाएँ, गुणसूत्र संख्या अपरिवर्तित।
- कोशिका चक्र = अंतरावस्था (G₁ → S → G₂) + M प्रावस्था; DNA प्रतिकृतियन S प्रावस्था में।
- केंद्रक विभाजन: पूर्वावस्था → (प्राक्-मध्यावस्था) → मध्यावस्था → पश्चावस्था → अंत्यावस्था; फिर कोशिकाद्रव्य विभाजन।
- पूर्वावस्था सबसे लंबी, पश्चावस्था सबसे छोटी; गुणसूत्र गिनने का सबसे अच्छा समय मध्यावस्था।
- गुणसूत्र सेंट्रोमियर से गिनें; पश्चावस्था में पूरी कोशिका में गुणसूत्र दोगुने।
- जंतु कोशिका में खाँच, पादप कोशिका में कोशिका पट्टिका; जंतु कोशिका में तारककेंद्र और एस्टर होते हैं।
- महत्व: वृद्धि, मरम्मत, अलैंगिक जनन, गुणसूत्र संख्या स्थिर रखना; अनियंत्रित विभाजन से कैंसर।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समसूत्री विभाजन किसे कहते हैं?
कोशिका विभाजन का वह प्रकार, जिसमें जनक कोशिका का केंद्रक एक बार बँटकर जनक के बराबर गुणसूत्र संख्या वाली दो संतति कोशिकाएँ बनाता है, समसूत्री विभाजन कहलाता है। संतति कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से जनक जैसी होती हैं, इसलिए इसे समीकरणीय विभाजन भी कहते हैं।
समसूत्री विभाजन की अवस्थाएं कौन-सी हैं?
पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था और अंत्यावस्था, जिसके बाद कोशिकाद्रव्य विभाजन होता है। कई किताबें पूर्वावस्था और मध्यावस्था के बीच प्राक्-मध्यावस्था को अलग अवस्था मानती हैं। अंतरावस्था विभाजन से पहले आती है, वह समसूत्री विभाजन की अवस्था नहीं है।
कोशिका विभाजन के कितने प्रकार हैं?
तीन: असूत्री विभाजन (एमाइटोसिस), समसूत्री विभाजन (माइटोसिस) और अर्धसूत्री विभाजन (मिओसिस)। बहुकोशिकीय जीवों की कायिक कोशिकाओं में समसूत्री और जनन मातृ कोशिकाओं में अर्धसूत्री विभाजन होता है।
समसूत्री विभाजन की सबसे छोटी और सबसे लंबी अवस्था कौन-सी है?
पश्चावस्था सबसे छोटी अवस्था है। पूर्वावस्था सबसे लंबी है, क्योंकि इसमें गुणसूत्रों का संघनन, केंद्रिका का गायब होना और तर्कु का बनना, सब होता है।
किस अवस्था में गुणसूत्र सबसे साफ़ दिखते हैं?
मध्यावस्था में। तब गुणसूत्र सबसे ज़्यादा संघनित होते हैं और सभी सेंट्रोमियर मध्यावस्था पट्टिका पर एक कतार में होते हैं, इसलिए उन्हें गिनना और पहचानना सबसे आसान होता है।
समसूत्री विभाजन की खोज किसने की?
जर्मन वैज्ञानिक वाल्थर फ्लेमिंग ने 1882 में सैलामैंडर की कोशिकाओं में विभाजन देखकर इसका वर्णन किया और इसे माइटोसिस नाम दिया। उससे पहले 1855 में रुडोल्फ विरचो ने कहा था कि हर कोशिका पहले से मौजूद कोशिका से बनती है।
पश्चावस्था में गुणसूत्र संख्या दोगुनी क्यों हो जाती है?
पश्चावस्था में हर सेंट्रोमियर बँट जाता है, इसलिए हर क्रोमैटिड अपने सेंट्रोमियर के साथ स्वतंत्र गुणसूत्र बन जाता है। गुणसूत्र सेंट्रोमियर से गिने जाते हैं, इसलिए कोशिका के बँटने तक पूरी कोशिका में संख्या दोगुनी दिखती है।
पादप कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन कैसे होता है?
पादप कोशिका में कठोर कोशिका भित्ति होती है, इसलिए खाँच नहीं बनती। बीच में गॉल्जी काय की पुटिकाएँ जमा होकर कोशिका पट्टिका बनाती हैं, जो बीच से बाहर की ओर बढ़कर भित्तियों से मिलती है और दो कोशिकाओं को अलग करती है।
समसूत्री विभाजन का महत्व क्या है?
इससे जीव की वृद्धि होती है, घाव भरते हैं और पुरानी कोशिकाओं की जगह नई बनती हैं, अलैंगिक जनन होता है और हर कायिक कोशिका में गुणसूत्र संख्या स्थिर रहती है। इसका नियंत्रण बिगड़ने पर कैंसर होता है।
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