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आँख कैसे देखती है: स्वच्छमंडल से दृष्टिपटल तक, कदम दर कदम

मानव नेत्र एक प्रकाशिक उपकरण है, जिसमें स्वच्छमंडल और अभिनेत्र लेंस प्रकाश को अपवर्तित करके दृष्टिपटल पर उलटा, वास्तविक और छोटा प्रतिबिंब बनाते हैं। दृष्टिपटल लेंस से 2.5 cm पीछे स्थिर है, इसलिए पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस की वक्रता बदलकर फ़ोकस ठीक रखती हैं। इसे समंजन कहते हैं: दूर की वस्तु पर 40 D, 25 cm पर 44 D।

चित्र पैमाने के अनुसार नहीं है: दूरियाँ और फ़ोकस का अंतर बढ़ाकर दिखाए गए हैं।

वस्तु के ऊपरी सिरे से प्रकाशअक्ष के अनुदिश प्रकाश

किसी भी अंग पर क्लिक करें या सूची से चुनें

गति

नियंत्रण

100 cm
50 %

आँख का प्रकार

मापन

वस्तु की दूरी
100cm
लेंस की क्षमता P = 1/f
41.00D
फ़ोकस दूरी f
2.44cm
प्रतिबिंब दूरी v (लेंस से दृष्टिपटल)
2.50cm
निकट बिंदु
25.0cm
दूर बिंदु
∞
पुतली का व्यास
5.0mm
पक्ष्माभी पेशियाँ
शिथिल
लेंस का आकार
पतला
प्रतिबिंब बन रहा है
दृष्टिपटल पर (स्पष्ट)

सिमुलेशन का उपयोग कैसे करें

  1. चलाएँ और वस्तु की दूरी का स्लाइडर खिसकाएँ। वस्तु पास आने पर पक्ष्माभी पेशी लाल होकर मोटी होती है, निलंबन स्नायु ढीले पड़ते हैं, लेंस फूलता है और उसकी क्षमता P बढ़ती है। प्रतिबिंब फिर भी दृष्टिपटल पर ही रहता है।
  2. प्रकाश की तीव्रता का स्लाइडर खिसकाएँ। रोशनी बढ़ने पर परितारिका पुतली को छोटा करती है, घटने पर बड़ा। कमरे की लाइट जलाने-बुझाने पर आपकी अपनी आँख में भी यही होता है।
  3. आँख के प्रकार में निकट-दृष्टि या दीर्घ-दृष्टि चुनें। प्रतिबिंब दृष्टिपटल के आगे या पीछे बनकर धुँधला हो जाएगा। अब “संशोधक लेंस लगाएँ” चुनें: अवतल या उत्तल लेंस प्रतिबिंब को दृष्टिपटल पर वापस ले आता है।
  4. चित्र के किसी भी अंग पर क्लिक करें, या सूची से चुनें। वह अंग चमकेगा और नीचे उसका कार्य लिखा आएगा। छोटी स्क्रीन पर नामों की जगह संख्याएँ दिखती हैं, उनकी सूची चित्र के नीचे है।
  5. दाईं ओर के मापन में लेंस की क्षमता, फ़ोकस दूरी, निकट बिंदु और दूर बिंदु देखें। दूरी 10 cm करने पर सामान्य आँख भी धुँधला देखेगी: यह निकट बिंदु के भीतर है।

पहले एक प्रयोग: बिंदु को गायब कर दीजिए

सादे कागज़ पर एक छोटा जोड़ चिह्न (+) बनाइए और उसके दाईं ओर 8 cm दूर एक मोटा बिंदु। कागज़ हाथ भर दूर पकड़िए, बाईं आँख बंद कीजिए और दाईं आँख से केवल जोड़ चिह्न को देखते रहिए। अब बिंदु की ओर देखे बिना कागज़ को धीरे-धीरे चेहरे के पास लाइए। लगभग 30 cm पर बिंदु अचानक गायब हो जाएगा। और पास लाने पर लौट आएगा।

हिसाब सीधा है। अंध बिंदु पीत बिंदु से लगभग 15° बगल में होता है, इसलिए बिंदु उस पर 8 ÷ tan 15° ≈ 30 cm की दूरी पर पड़ता है। आपने अभी अपनी आँख में वह जगह ढूँढ ली, जहाँ प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ बिल्कुल नहीं हैं।

रोज़ यह पता नहीं चलता, क्योंकि दोनों आँखों के अंध बिंदु अलग जगह पड़ते हैं और मस्तिष्क आसपास के दृश्य से खाली जगह भर देता है। इस पृष्ठ पर आँख को खोलकर देखेंगे। आगे एक और अजीब बात आएगी: दृष्टिपटल पर चित्र पूरी तरह उलटा बनता है, फिर भी दुनिया हमें सीधी दिखती है।

आँख एक जीवित कैमरा है

आँख की तुलना कैमरे से करने पर अंग याद रखना आसान हो जाता है। दोनों एक अँधेरे डिब्बे में प्रकाश आने देते हैं और परदे पर चित्र बनाते हैं। फ़र्क यह है कि आँख अपना प्रकाश, अपना फ़ोकस और अपना परदा खुद सँभालती है।

कैमरे का भागआँख का भागकार्य
लेंसस्वच्छमंडल और अभिनेत्र लेंसप्रकाश को मोड़कर फ़ोकस पर लाते हैं
डायाफ़्राम (द्वारक)परितारिका और पुतलीकितना प्रकाश जाए, यह तय करते हैं
फ़िल्म या सेंसरदृष्टिपटलप्रकाश पकड़कर विद्युत संकेत बनाता है
अँधेरा डिब्बानेत्रगोलक (श्वेतपटल और कोरॉइड)फालतू प्रकाश रोककर चित्र साफ़ रखता है
लेंस आगे-पीछे करके फ़ोकसलेंस का आकार बदलना (समंजन)पास और दूर की वस्तु पर फ़ोकस
केबलदृक् तंत्रिकासंकेत मस्तिष्क तक ले जाती है
लेंस ढक्कनपलकआँख ढकती है और धूल हटाती है

अंगों को जानिए: हर एक का एक काम

मानव नेत्रगोलक लगभग गोलाकार है, व्यास करीब 2.3 cm। बाहर से भीतर प्रकाश के रास्ते पर चलकर अंग देखते हैं। नीचे के छह भाग पढ़ें, फिर बारह अंगों की सारणी में सब एक जगह मिलेंगे। सिमुलेशन में हर अंग पर क्लिक करके भी मिला सकते हैं।

श्वेतपटल और कोरॉइड: बाहरी दीवार

आँख का सफ़ेद भाग श्वेतपटल है, मज़बूत सफ़ेद आवरण, जो नेत्रगोलक का आकार थामे रखता है और भीतर की रक्षा करता है। उसके नीचे गहरे रंग की कोरॉइड परत है, जिसमें रक्त वाहिकाएँ हैं। कोरॉइड फालतू प्रकाश सोख लेती है ताकि वह भीतर टकराकर चित्र धुँधला न करे, जैसे कैमरे के भीतर काला रंग।

स्वच्छमंडल और नेत्रोद: आगे की खिड़की

सामने का पारदर्शी गुंबद स्वच्छमंडल (कॉर्निया) है। इसमें रक्त वाहिकाएँ नहीं होतीं, इसीलिए यह साफ़ है। प्रकाश का अधिकांश अपवर्तन यहीं होता है, आँख की कुल क्षमता का लगभग दो-तिहाई। इसके पीछे लेंस तक की जगह में नेत्रोद (जलीय द्रव) भरा है, पानी जैसा साफ़ द्रव। यह कॉर्निया का आकार बनाए रखता है, कॉर्निया और लेंस को पोषण देता है और अपवर्तन में थोड़ी मदद करता है।

परितारिका और पुतली: घटने-बढ़ने वाला छिद्र

परितारिका (आइरिस) रंगीन पेशी का परदा है: किसी की भूरी, किसी की नीली। उसके बीच का गोल छिद्र पुतली है। परितारिका में दो तरह की पेशियाँ हैं। गोलाकार पेशियाँ सिकुड़ें तो पुतली छोटी होती है, त्रिज्य पेशियाँ सिकुड़ें तो बड़ी। इस तरह परितारिका आँख का प्रकाश-नियंत्रक है।

लेंस, पक्ष्माभी पेशियाँ और निलंबन स्नायु: फ़ोकस की टीम

अभिनेत्र लेंस पारदर्शी, लचीला और उत्तल होता है। स्वच्छमंडल मोटा मोड़ देने का काम कर चुकता है, तब लेंस बारीक समायोजन करके प्रतिबिंब को ठीक दृष्टिपटल पर बिठाता है। लेंस को पक्ष्माभी पेशियों का छल्ला घेरे रहता है, और महीन निलंबन स्नायु लेंस को उसी छल्ले से लटकाए रखते हैं। पास देखने पर पक्ष्माभी पेशी सिकुड़ती है, स्नायु ढीले होते हैं और लचीला लेंस अपने आप फूलकर मोटा हो जाता है। दूर देखने पर पेशी शिथिल होती है, स्नायु तनकर लेंस को खींचकर पतला कर देते हैं।

काचाभ द्रव: भीतर की जेली

लेंस के पीछे का बड़ा कक्ष साफ़ जेली जैसे काचाभ द्रव से भरा है। यह नेत्रगोलक को गोल और दृढ़ रखता है, और प्रकाश इसमें से होकर दृष्टिपटल तक पहुँचता है। नेत्रोद की तरह इसका भी पारदर्शी होना ज़रूरी है, वरना चित्र पहुँचता ही नहीं।

दृष्टिपटल, पीत बिंदु, अंध बिंदु और दृक् तंत्रिका: परदा और उसका तार

दृष्टिपटल (रेटिना) आँख के पिछले भीतरी हिस्से पर बिछा है और उसमें प्रकाश-संवेदी शलाका (रॉड) और शंकु (कोन) कोशिकाएँ हैं। उसके केंद्र में छोटा गड्ढा है, पीत बिंदु, जो शंकु कोशिकाओं से ठसाठस भरा है; सबसे तीक्ष्ण दृष्टि यहीं से मिलती है। इसीलिए आँखें घूमकर पढ़ी जा रही चीज़ को पीत बिंदु पर गिराती हैं। पीत बिंदु के पास से दृक् तंत्रिका आँख छोड़कर मस्तिष्क जाती है। उस निकास पर कोई संवेदी कोशिका नहीं है, यही अंध बिंदु है, जो आपने शुरू में ढूँढा।

अंगक्या हैकार्य
स्वच्छमंडलसामने का पारदर्शी गुंबदअपवर्तन का अधिकांश भाग
नेत्रोद (जलीय द्रव)कॉर्निया और लेंस के बीच का द्रवआकार, पोषण, थोड़ा अपवर्तन
परितारिकारंगीन पेशी का परदापुतली का आकार बदलती है
पुतलीपरितारिका का छिद्रप्रकाश के भीतर जाने का रास्ता
अभिनेत्र लेंससाफ़, लचीला उत्तल लेंसबारीक फ़ोकस, समंजन
पक्ष्माभी पेशियाँलेंस के चारों ओर पेशी का छल्लासिकुड़कर लेंस को मोटा करती हैं
निलंबन स्नायुपेशी और लेंस के बीच के तंतुतने हों तो लेंस पतला रखते हैं
काचाभ द्रवलेंस के पीछे की जेलीआकार बनाए रखता है, प्रकाश जाने देता है
दृष्टिपटलभीतर का प्रकाश-संवेदी परदाप्रतिबिंब को संकेतों में बदलता है
पीत बिंदुदृष्टिपटल के केंद्र का गड्ढासबसे तीक्ष्ण, रंगीन दृष्टि
अंध बिंदुजहाँ तंत्रिका बाहर निकलती हैकोई संवेदी कोशिका नहीं
दृक् तंत्रिकादृष्टिपटल से मस्तिष्क का तारसंकेत ले जाती है

प्रतिबिंब बनता कैसे है

मान लीजिए सामने एक पेड़ है। पेड़ के हर बिंदु से प्रकाश फैलता है और उसका कुछ भाग आपकी आँख में आता है। रास्ता कदम दर कदम देखें।

1/f = 1/v − 1/uलेंस सूत्र, कार्तीय चिह्न परिपाटी में: वस्तु बाईं ओर है, इसलिए u ऋणात्मक

P = 1/fक्षमता; f मीटर में हो तो इकाई डायोप्टर (D) है। f सेंटीमीटर में हो तो P = 100 ÷ f

  • प्रकाश स्वच्छमंडल पर पड़ता है। वह उसे सबसे ज़्यादा मोड़ता है, और किरणें पास आना शुरू करती हैं।
  • नेत्रोद से गुज़रकर प्रकाश पुतली तक पहुँचता है। परितारिका तय करती है कि कितना प्रकाश निकले।
  • लेंस प्रकाश को और मोड़कर बारीकी से फ़ोकस करता है। पास या दूर की वस्तु के लिए फ़ोकस यहीं बदलता है।
  • काचाभ द्रव से होकर प्रकाश दृष्टिपटल पर पहुँचता है और छोटा, उलटा, वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है।
  • शलाका और शंकु कोशिकाएँ प्रकाश को विद्युत संकेतों में बदलती हैं, जिन्हें दृक् तंत्रिका मस्तिष्क तक ले जाती है।
  • मस्तिष्क उलटे चित्र को सीधा पढ़ लेता है, और दोनों आँखों की तुलना से गहराई का अंदाज़ा भी लगाता है।

समंजन: पास-दूर फ़ोकस बदलना

प्रतिबिंब दूरी v स्थिर है: लेंस से दृष्टिपटल 2.5 cm। फिर भी वस्तु कभी 25 cm पर होती है, कभी सौ मीटर पर। लेंस सूत्र कहता है कि v वही रहे और u बदले तो f को भी बदलना पड़ेगा। आँख यही करती है, अपने लेंस की वक्रता बदलकर। इस क्षमता को समंजन कहते हैं।

दूर की वस्तु के लिए 1/u लगभग शून्य है, इसलिए 1/f = 1/2.5 = 0.40 cm⁻¹। इससे f = 2.5 cm और क्षमता P = 40 D। 25 cm दूर की वस्तु के लिए 1/f = 0.40 + 0.04 = 0.44 cm⁻¹, यानी f = 2.27 cm और P = 44 D। पूरे परास में पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस की क्षमता केवल 4 D बदलती हैं। स्वच्छमंडल स्थिर रहता है, इसलिए इतना छोटा परिवर्तन काफ़ी है।

जिस न्यूनतम दूरी तक आँख साफ़ देखती है, वह निकट बिंदु है, सामान्य आँख में 25 cm (इसे सुस्पष्ट दर्शन की न्यूनतम दूरी भी कहते हैं)। सबसे दूर का बिंदु दूर बिंदु है, जो सामान्य आँख के लिए अनंत है। इसलिए सामान्य आँख 25 cm से अनंत तक साफ़ देखती है।

दूर की वस्तु देखते समयपास की वस्तु देखते समय
पक्ष्माभी पेशियाँशिथिलसिकुड़ी हुई
निलंबन स्नायुतने हुएढीले
लेंसपतला, कम वक्रमोटा, अधिक वक्र
फ़ोकस दूरी fअधिक, 2.5 cmकम, 2.27 cm (वस्तु 25 cm पर)
क्षमता Pकम, 40 Dअधिक, 44 D

पुतली का प्रतिवर्ती कार्य: अपने आप चलने वाला चश्मा

अँधेरे कमरे में जाते ही पहले कुछ नहीं दिखता, फिर धीरे-धीरे दिखने लगता है। फिर रोशनी में लौटें तो आँखें चौंधिया जाती हैं, फिर ठीक हो जाती हैं। पुतली प्रकाश के हिसाब से आकार बदल रही होती है। तेज़ रोशनी में गोलाकार पेशियाँ सिकुड़ती हैं और पुतली छोटी होती है, इस सिमुलेशन में 2 mm तक। अँधेरे में त्रिज्य पेशियाँ पुतली को खींचकर चौड़ा कर देती हैं, सिमुलेशन में 8 mm तक।

व्यास 8 mm से 2 mm होने पर छिद्र का क्षेत्रफल 16 गुना घट जाता है, क्योंकि क्षेत्रफल व्यास के वर्ग के साथ बढ़ता है। 50% प्रकाश पर सिमुलेशन की पुतली 5.0 mm की रहती है। यह प्रतिवर्ती क्रिया मस्तिष्क बिना सोचे करता है; आप जान-बूझकर पुतली छोटी-बड़ी नहीं कर सकते।

अँधेरे से तालमेल बिठाने में बहुत अधिक समय लगता है, लगभग आधा घंटा, क्योंकि तब शलाका कोशिकाओं का वर्णक दोबारा बनता है। पुतली कुछ सेकंड में प्रतिक्रिया देती है; धीमा काम वर्णक का है।

शलाका और शंकु: दृष्टिपटल के दो तरह के कर्मचारी

दृष्टिपटल में मुख्यतः दो तरह की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ हैं। शलाका (रॉड) बहुत मंद प्रकाश में भी काम करती हैं पर रंग नहीं पहचानतीं, इसीलिए रात के धुँधलके में सब कुछ भूरा-सा दिखता है। शंकु (कोन) को तेज़ प्रकाश चाहिए और वे रंग तथा बारीक ब्योरा पहचानते हैं। शंकु तीन तरह के हैं, लाल, हरे और नीले प्रकाश के प्रति सबसे संवेदी, और मस्तिष्क इनके मेल से सारे रंग बनाता है।

विशेषताशलाका कोशिकाएँशंकु कोशिकाएँ
संख्या (लगभग)करीब 12 करोड़करीब 60 लाख
कब काम करती हैंमंद प्रकाश मेंतेज़ प्रकाश में
रंग पहचानती हैं?नहींहाँ
कहाँ अधिकदृष्टिपटल के किनारों की ओरपीत बिंदु में ठसाठस
प्रकारएकतीन (लाल, हरा, नीला)
किसमें अच्छीरात और बगल की दृष्टितीक्ष्ण, रंगीन दृष्टि

दृष्टि दोष और लेंस से उनका निवारण

जब प्रतिबिंब ठीक दृष्टिपटल पर नहीं बनता, दृष्टि धुँधली हो जाती है। सिमुलेशन में दो मुख्य दोषों को सबसे सरल रूप में दिखाया गया है: फ़ोकस करने वाली व्यवस्था वही रहती है, केवल दृष्टिपटल की दूरी बदलती है। संशोधक लेंस एक अतिरिक्त लेंस है, जो प्रकाश के आँख में घुसने से पहले उसकी दिशा थोड़ी बदल देता है।

निकट-दृष्टि दोष: पास साफ़, दूर धुँधला

मान लीजिए दृष्टिपटल थोड़ा ज़्यादा पीछे है, या लेंस थोड़ा ज़्यादा वक्र। दूर की वस्तु का प्रकाश दृष्टिपटल तक पहुँचने से पहले ही एक जगह मिल जाता है और फिर फैल जाता है। प्रतिबिंब दृष्टिपटल के आगे बनता है। इस सिमुलेशन में दृष्टिपटल लेंस से 2.58 cm पर है, सामान्य से लगभग 0.8 mm पीछे, इसलिए दूर बिंदु घटकर 80 cm रह जाता है।

निवारण ऐसा लेंस है जो दूर की वस्तु का आभासी प्रतिबिंब आँख के दूर बिंदु पर बना दे। वह अवतल लेंस है, जिसकी क्षमता ऋणात्मक होती है: यहाँ −1.25 D। इसे पहनने पर आँख दूर की वस्तु को ऐसे देखती है मानो वह 80 cm पर हो, और आँख का अपना लेंस उसे फ़ोकस कर लेता है।

दीर्घ-दृष्टि दोष: दूर साफ़, पास धुँधला

यहाँ दृष्टिपटल थोड़ा ज़्यादा पास है, या लेंस थोड़ा कम वक्र। पास की वस्तु का प्रकाश जुड़ने से पहले ही दृष्टिपटल पर पहुँच जाता है, इसलिए प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे बनता है। सिमुलेशन में दृष्टिपटल लेंस से 2.33 cm पर है, सामान्य से लगभग 1.7 mm पास, और निकट बिंदु खिसककर 100 cm हो जाता है। दूर की वस्तु के लिए भी आँख को पहले से लेंस ज़्यादा वक्र करना पड़ता है, जो थका देता है।

निवारण धनात्मक क्षमता का उत्तल लेंस है, यहाँ +3.0 D। 25 cm पर पकड़ी किताब उसमें से 100 cm दूर के आभासी प्रतिबिंब जैसी दिखती है, जिसे आँख आराम से फ़ोकस कर लेती है।

तीन और दोष, संक्षेप में

उम्र बढ़ने पर (आम तौर पर चालीस के बाद) पक्ष्माभी पेशियाँ कमज़ोर और लेंस कड़ा हो जाता है, इसलिए समंजन घटता है। निकट बिंदु दूर खिसक जाता है और छोटे अक्षर पढ़ना कठिन हो जाता है। इसे जरा-दूरदृष्टिता (प्रेसबायोपिया) कहते हैं। द्विफ़ोकसी चश्मे में ऊपर का भाग अवतल और नीचे का उत्तल होता है, एक ही चश्मे में दूर और पास दोनों चल जाते हैं।

यदि स्वच्छमंडल पूरी तरह गोल न हो, तो एक दिशा की रेखाएँ साफ़ और दूसरी की धुँधली दिखती हैं। इसे दृष्टिवैषम्य (अस्टिग्मैटिज़्म) कहते हैं, इसे बेलनाकार लेंस से सुधारा जाता है। लेंस धुंधला हो जाए तो मोतियाबिंद (कैटरैक्ट) होता है, जिसका इलाज शल्य क्रिया है: धुंधला लेंस हटाकर कृत्रिम लेंस लगाया जाता है।

यदि किसी एक प्रकार के शंकु काम न करें, तो वर्णांधता होती है, सबसे आम लाल और हरे का घालमेल। यह वंशानुगत है और पुरुषों में अधिक पाई जाती है।

निकट-दृष्टि दोष (मायोपिया)दीर्घ-दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया)
समस्यादूर की वस्तुएँ धुँधलीपास की वस्तुएँ धुँधली
कारणनेत्रगोलक लंबा, या लेंस अधिक वक्रनेत्रगोलक छोटा, या लेंस कम वक्र
प्रतिबिंब बनता हैदृष्टिपटल के आगेदृष्टिपटल के पीछे
संशोधक लेंसअवतल (अपसारी)उत्तल (अभिसारी)
सिमुलेशन मेंदूर बिंदु 80 cm, निकट बिंदु 19.0 cmनिकट बिंदु 100 cm, दूर बिंदु अनंत

सिमुलेशन में खुद करके देखिए

हर प्रयोग में एक मिनट से कम लगता है, और हर एक से कोई विचार पक्का हो जाता है।

1. वस्तु पास लाइए, लेंस को फूलते देखिए

दूरी का स्लाइडर दूर वाले सिरे (500 cm) पर रखिए। पक्ष्माभी पेशी लगभग शिथिल है, लेंस पतला है, क्षमता लगभग 40 D। अब धीरे-धीरे 25 cm तक लाइए। पक्ष्माभी पेशी मोटी होती जाती है, स्नायु लहरदार होकर ढीले पड़ते हैं, लेंस फूलता है और क्षमता 44 D तक पहुँचती है। इस पूरे समय प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर ही रहता है।

2. निकट बिंदु के भीतर जाइए

सामान्य आँख में दूरी 25 cm से कम कीजिए। प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे चला जाता है और धुँधला हो जाता है, क्योंकि क्षमता अपने अधिकतम 44 D पर अटक गई है। 10 cm पर साफ़ प्रतिबिंब के लिए 50 D चाहिए, जो आँख की सामर्थ्य से बाहर है। किताब बहुत पास रखने पर अक्षर इसीलिए धुँधले होते हैं।

3. रोशनी घटाइए-बढ़ाइए

प्रकाश को 0% कीजिए: पुतली 8 mm तक खुल जाती है और किरण-पुंज चौड़ा होता है। 100% करने पर 2 mm, पतला पुंज। प्रतिवर्त का संकेत तुरंत चलता है पर पुतली धीरे-धीरे प्रतिक्रिया देती है, जैसे असल में।

4. निकट-दृष्टि दोष चालू कीजिए

आँख का प्रकार “निकट-दृष्टि दोष” चुनिए और वस्तु को दूर (500 cm) ले जाइए। प्रतिबिंब दृष्टिपटल के आगे है: किरणें पहले मिलकर फिर फैलती हैं, दृष्टिपटल पर धुँधला धब्बा बनता है। अब वस्तु को 80 cm पर लाइए तो चित्र साफ़ हो जाता है। यही इस आँख का दूर बिंदु है।

5. अवतल लेंस लगाइए

“संशोधक लेंस लगाएँ” चुनिए। आँख के सामने अवतल लेंस आ जाता है और किरणें थोड़ी फैल जाती हैं। प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर लौट आता है और दूर बिंदु अनंत पर चला जाता है। 25 cm पर पढ़ना अब भी ठीक रहता है, क्योंकि संशोधित आँख का निकट बिंदु फिर 25 cm है।

6. दीर्घ-दृष्टि दोष और उत्तल लेंस

आँख का प्रकार “दीर्घ-दृष्टि दोष” कीजिए और वस्तु 25 cm पर रखिए: प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे। अब लेंस लगाइए। उत्तल लेंस किरणों को पहले से थोड़ा जोड़ देता है, प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर बैठता है और निकट बिंदु 100 cm से 25 cm पर आ जाता है।

हल किए हुए प्रश्न

हर उत्तर सिमुलेशन के अपने मॉडल से निकाला गया है। कार्तीय चिह्न परिपाटी में वस्तु लेंस के बाईं ओर होती है, इसलिए u ऋणात्मक है; प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर है, इसलिए v = +2.5 cm।

प्रश्न 1: निकट बिंदु पर लेंस की क्षमता

सामान्य आँख में दृष्टिपटल लेंस से 2.5 cm पीछे है। 25 cm दूर की वस्तु देखने के लिए लेंस की क्षमता कितनी चाहिए?

u = −25 cm, v = +2.5 cm। 1/f = 1/v − 1/u = 1/2.5 + 1/25 = 0.40 + 0.04 = 0.44 cm⁻¹। अतः f = 2.27 cm और P = 100 ÷ 2.27 = 44 D।

प्रश्न 2: अनंत पर रखी वस्तु

दूर के पहाड़ को देखने के लिए उसी आँख को कितनी क्षमता चाहिए?

u = −∞ के लिए 1/u = 0। 1/f = 1/2.5 = 0.40 cm⁻¹, f = 2.5 cm, P = 40 D। यहाँ पक्ष्माभी पेशी शिथिल है और लेंस सबसे पतला।

प्रश्न 3: समंजन का परास

एक छात्र 25 cm पर रखे पृष्ठ से दूर की पहाड़ी की ओर देखता है। लेंस की क्षमता कितनी बदली?

25 cm पर 44 D, अनंत पर 40 D। परिवर्तन = 44 − 40 = 4 D। बीच की दूरी 50 cm पर P = 42 D और f = 2.38 cm।

प्रश्न 4: सिमुलेशन की डिफ़ॉल्ट दूरी

वस्तु 100 cm दूर है। लेंस की क्षमता और फ़ोकस दूरी निकालिए।

1/f = 0.40 + 0.01 cm⁻¹। P = 41 D और f = 2.44 cm। सिमुलेशन शुरू होने पर मापन पैनल में यही मान दिखते हैं।

प्रश्न 5: दृष्टिपटल पर पेड़ का प्रतिबिंब कितना बड़ा

5 m ऊँचा एक पेड़ 50 m दूर है। दृष्टिपटल पर उसका प्रतिबिंब कितना ऊँचा बनेगा? (v = 2.5 cm)

आवर्धन m = v ÷ u, इसलिए प्रतिबिंब की ऊँचाई = वस्तु की ऊँचाई × v ÷ दूरी = 500 × 2.5 ÷ 5,000 = 0.25 cm = 2.5 mm। इतने छोटे प्रतिबिंब में इतना ब्योरा इसलिए आ पाता है कि पीत बिंदु शंकु कोशिकाओं से भरा है।

प्रश्न 6: निकट-दृष्टि दोष का चश्मा

एक व्यक्ति का दूर बिंदु 80 cm है। दूर की वस्तुएँ साफ़ देखने के लिए कौन-सा लेंस चाहिए?

दूर की वस्तु का प्रकाश समानांतर होता है, इसलिए u = −∞। लेंस को प्रतिबिंब दूर बिंदु पर बनाना है, v = −80 cm। 1/f = 1/v − 1/u = −1/80 − 0, अतः f = −80 cm और P = −1.25 D। अवतल लेंस।

प्रश्न 7: अधिक निकट-दृष्टि दोष

दूर बिंदु 200 cm हो तो कितनी क्षमता चाहिए? और 50 cm हो तो?

P = −100 ÷ दूर बिंदु। 200 cm के लिए P = −0.50 D; 50 cm के लिए P = −2.00 D। दूर बिंदु जितना पास, लेंस उतना शक्तिशाली।

प्रश्न 8: दीर्घ-दृष्टि दोष का चश्मा

एक व्यक्ति का निकट बिंदु 100 cm है। 25 cm पर किताब पढ़ने के लिए कौन-सा लेंस चाहिए?

किताब u = −25 cm पर है। लेंस को आभासी प्रतिबिंब निकट बिंदु पर बनाना है, v = −100 cm। 1/f = 1/v − 1/u = −1/100 + 1/25 = 0.03 cm⁻¹। f = 33.3 cm और P = +3.0 D। उत्तल लेंस।

प्रश्न 9: एक और दीर्घ-दृष्टि दोष

निकट बिंदु 50 cm है। 25 cm पर पढ़ने के लिए कौन-सा लेंस चाहिए?

P = 100 ÷ 25 − 100 ÷ 50 = +2.0 D, अतः f = 50 cm। उत्तल।

प्रश्न 10: पुतली का क्षेत्रफल

पुतली 8 mm से घटकर 2 mm हो जाती है। आँख में जाने वाला प्रकाश कितने गुना घटता है?

क्षेत्रफल ∝ व्यास²। अनुपात = (8 ÷ 2)² = 16। भीतर जाने वाला प्रकाश 16 गुना तक घट जाता है।

आम ग़लतियाँ

इस विषय में अंक कटने के कारण अक्सर वही रहते हैं। उत्तर जमा करने से पहले एक-एक मिलाइए।

  • दृष्टिपटल का प्रतिबिंब सीधा बनाना। वह उलटा, वास्तविक और छोटा है; सीधा मस्तिष्क करता है।
  • समंजन में लेंस के खिसकने की बात लिखना। लेंस खिसकता नहीं, उसकी वक्रता बदलती है।
  • पास देखने पर पक्ष्माभी पेशी शिथिल लिखना। पास देखने पर वह सिकुड़ती है और लेंस मोटा होता है।
  • निकट-दृष्टि दोष के लिए उत्तल लेंस लिखना। निकट-दृष्टि में अवतल, दीर्घ-दृष्टि में उत्तल लेंस लगता है।
  • निकट-दृष्टि का मतलब “पास नहीं दिखता” समझना। उल्टा है: पास साफ़ दिखता है, दूर धुँधला।
  • अपवर्तन का अधिकांश भाग लेंस में बताना। अधिकांश अपवर्तन स्वच्छमंडल में होता है; लेंस केवल बारीक समायोजन करता है।
  • पीत बिंदु और अंध बिंदु उलझाना। पीत बिंदु में सबसे अधिक शंकु और सबसे तीक्ष्ण दृष्टि है। अंध बिंदु में कोई संवेदी कोशिका नहीं है।
  • शलाका और शंकु की भूमिकाएँ उलट देना। शलाका मंद प्रकाश, रंग नहीं; शंकु तेज़ प्रकाश और रंग।
  • इकाई ग़लत लिखना। एक डायोप्टर = 1 ÷ फ़ोकस दूरी (मीटर में)। cm में f हो तो 100 ÷ f।
  • अवतल लेंस की क्षमता धनात्मक लिखना। अवतल लेंस की f और P दोनों ऋणात्मक होती हैं।

आँखों की देखभाल

ये पाठ्यपुस्तक स्तर की सामान्य सलाहें हैं, चिकित्सा-परामर्श नहीं। आँखों में कोई समस्या लगे तो नेत्र-चिकित्सक को दिखाना ही सही है।

देर तक पास का काम करने से पक्ष्माभी पेशियाँ थकती हैं। हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड किसी दूर की चीज़ को देखिए; पेशी शिथिल होकर आराम पाती है। पर्याप्त रोशनी में पढ़िए और किताब आँखों से लगभग 25 cm दूर रखिए। लेटकर या चलती गाड़ी में पढ़ने से दूरी बार-बार बदलती है और आँखों पर ज़ोर पड़ता है।

सीधे सूरज या बहुत तेज़ रोशनी की ओर न देखें; इससे दृष्टिपटल जल सकता है। गंदे हाथों से आँखें न मलें, कॉर्निया आसानी से खरोंच जाता है। आँख में कुछ पड़ जाए तो साफ़ पानी से धो लें।

विटामिन A से भरपूर चीज़ें खाइए: गाजर, पीला कद्दू, अंडा, कलेजी, हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ। साल में एक बार जाँच कराने से निकट या दीर्घ दृष्टि का दोष जल्दी पकड़ में आ जाता है।

मृत्यु के बाद नेत्रदान से किसी और को कॉर्निया प्रत्यारोपण द्वारा रोशनी मिल सकती है। केवल कॉर्निया ही प्रत्यारोपित होता है, और यह मृत्यु के कुछ ही घंटों के भीतर होना चाहिए। इस बारे में परिवार से पहले बात कर लेना अच्छा है।

परीक्षा कोना: सीबीएसई कक्षा 10

सीबीएसई कक्षा 10 विज्ञान का अध्याय “मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार” इसी विषय पर है, और जीव विज्ञान के पाठों में भी आँख आती है। यहाँ संरचना, कार्य, दृष्टि दोष और लेंस की क्षमता, सब पर प्रश्न बनते हैं।

अति लघु उत्तरीय: “समंजन क्षमता क्या है?”, “अंध बिंदु क्या है?”, “लेंस की क्षमता का SI मात्रक क्या है?”। चित्र आधारित: आँख का आरेख बनाकर स्वच्छमंडल, परितारिका, पुतली, लेंस, पक्ष्माभी पेशी, काचाभ द्रव, दृष्टिपटल, पीत बिंदु और दृक् तंत्रिका नामांकित करना। अंगों के नाम उसी क्रम में लिखिए जिसमें प्रकाश उनसे मिलता है, तो नामांकन मिलाना आसान हो जाता है।

लघु उत्तरीय: “पास देखने पर पक्ष्माभी पेशी क्यों सिकुड़ती है?”, “अँधेरे में पुतली क्यों बड़ी हो जाती है?”, “दृष्टिपटल पर उलटा प्रतिबिंब बनने पर भी हम सीधा क्यों देखते हैं?”। संख्यात्मक: दूर बिंदु या निकट बिंदु से चश्मे की क्षमता। पहले 1/f = 1/v − 1/u लिखिए, चिह्न सहित मान रखिए और अंत में इकाई D लिखिए। दीर्घ उत्तरीय: किसी व्यक्ति को अवतल या उत्तल लेंस क्यों चाहिए, इसकी व्याख्या।

बहुविकल्पीय प्रश्नों में बार-बार आता है: सबसे अधिक अपवर्तन कहाँ होता है, शंकु कहाँ अधिक हैं, कौन-सा लेंस किस दोष को सुधारता है। तुलना सारणी में निकट और दीर्घ दृष्टि की एक-एक पंक्ति रखिए: कारण, प्रतिबिंब कहाँ बनता है, कौन-सा लेंस। उत्तर में हमेशा आरेख और इकाई दीजिए।

एक नज़र में दोहराव

परीक्षा से पहले यह पढ़ लीजिए; हर पंक्ति एक संभावित प्रश्न है।

  • प्रकाश का मार्ग: स्वच्छमंडल, नेत्रोद, पुतली, लेंस, काचाभ द्रव, दृष्टिपटल।
  • दृष्टिपटल पर प्रतिबिंब उलटा, वास्तविक और छोटा; मस्तिष्क उसे सीधा समझता है।
  • अपवर्तन का अधिकांश स्वच्छमंडल में; लेंस बारीक फ़ोकस करता है। प्रतिबिंब दूरी लगभग 2.5 cm स्थिर।
  • समंजन: पास देखने पर पक्ष्माभी पेशी सिकुड़ती है, स्नायु ढीले, लेंस मोटा, P अधिक (44 D); दूर देखने पर उलटा (40 D)।
  • सामान्य आँख का निकट बिंदु 25 cm और दूर बिंदु अनंत।
  • परितारिका पुतली का आकार बदलती है: तेज़ रोशनी में छोटी, अँधेरे में बड़ी।
  • शलाका: मंद प्रकाश, रंग नहीं। शंकु: तेज़ प्रकाश, रंग। पीत बिंदु में सबसे अधिक शंकु।
  • अंध बिंदु पर संवेदी कोशिकाएँ नहीं होतीं, क्योंकि वहीं से दृक् तंत्रिका निकलती है।
  • निकट-दृष्टि दोष: प्रतिबिंब दृष्टिपटल के आगे, अवतल लेंस, ऋणात्मक क्षमता।
  • दीर्घ-दृष्टि दोष: प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे, उत्तल लेंस, धनात्मक क्षमता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दृष्टिपटल पर प्रतिबिंब उलटा क्यों बनता है?

स्वच्छमंडल और लेंस मिलकर उत्तल लेंस की तरह काम करते हैं, और उत्तल लेंस उलटा वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है। दृष्टिपटल केवल संकेत भेजता है, और जन्म से मस्तिष्क उन्हें सीधे चित्र की तरह पढ़ना सीख लेता है।

आँख की समंजन क्षमता क्या है?

आँख की वह क्षमता, जिससे वह अपने लेंस की फ़ोकस दूरी बदलकर अलग-अलग दूरी की वस्तुओं के साफ़ प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर बनाती है, समंजन क्षमता कहलाती है। पक्ष्माभी पेशियाँ सिकुड़कर या शिथिल होकर लेंस को मोटा या पतला करती हैं।

सामान्य आँख का निकट बिंदु और दूर बिंदु कितना होता है?

निकट बिंदु (सुस्पष्ट दर्शन की न्यूनतम दूरी) लगभग 25 cm और दूर बिंदु अनंत होता है। सामान्य आँख 25 cm से अनंत तक साफ़ देखती है, और उम्र के साथ निकट बिंदु दूर खिसकता जाता है।

निकट-दृष्टि दोष और दीर्घ-दृष्टि दोष में क्या अंतर है?

निकट-दृष्टि दोष में पास की वस्तुएँ साफ़ और दूर की धुँधली दिखती हैं; प्रतिबिंब दृष्टिपटल के आगे बनता है और अवतल लेंस से ठीक होता है। दीर्घ-दृष्टि दोष में दूर की वस्तुएँ साफ़ और पास की धुँधली दिखती हैं; प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे बनता है और उत्तल लेंस से ठीक होता है।

पीत बिंदु और अंध बिंदु में क्या अंतर है?

पीत बिंदु दृष्टिपटल के केंद्र का छोटा गड्ढा है जिसमें सबसे अधिक शंकु कोशिकाएँ होती हैं, इसलिए यहाँ सबसे तीक्ष्ण दृष्टि मिलती है। अंध बिंदु वह जगह है जहाँ दृक् तंत्रिका आँख से निकलती है। वहाँ प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ नहीं होतीं, इसलिए वहाँ पड़ा प्रतिबिंब दिखाई नहीं देता।

शलाका और शंकु कोशिकाएँ क्या करती हैं?

शलाका कोशिकाएँ मंद प्रकाश में काम करती हैं और रंग नहीं पहचानतीं। शंकु कोशिकाएँ तेज़ प्रकाश में काम करती हैं और रंग तथा बारीक ब्योरा पहचानती हैं। शंकु तीन प्रकार के होते हैं, लाल, हरे और नीले प्रकाश के प्रति संवेदी।

तेज़ रोशनी में पुतली छोटी क्यों हो जाती है?

बहुत अधिक प्रकाश दृष्टिपटल को नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए तेज़ रोशनी में परितारिका की गोलाकार पेशियाँ सिकुड़कर पुतली छोटी कर देती हैं और कम प्रकाश भीतर जाता है। अँधेरे में त्रिज्य पेशियाँ उसे बड़ा कर देती हैं। यह मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित स्वचालित प्रतिवर्त है।

डायोप्टर क्या है?

डायोप्टर (D) लेंस की क्षमता का मात्रक है। क्षमता मीटर में फ़ोकस दूरी का व्युत्क्रम होती है, इसलिए f = 1 m वाले लेंस की क्षमता 1 D है। उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक और अवतल लेंस की ऋणात्मक होती है।

चश्मे का लेंस धुँधली दृष्टि कैसे ठीक करता है?

चश्मे का लेंस प्रकाश के आँख में घुसने से पहले उसकी अभिसारिता को थोड़ा बदल देता है, ताकि आँख की अपनी फ़ोकस व्यवस्था प्रतिबिंब को ठीक दृष्टिपटल पर बना सके। अवतल लेंस प्रकाश को फैलाता है, उत्तल लेंस उसे जोड़ता है।

इस विषय पर और पढ़ाई

एनिमेशन से अवधारणा साफ़ हुई, अब परीक्षा की तैयारी: सिलेबस, सुझाव, किताबें और प्रवेश परीक्षा गाइड नीचे हैं (अंग्रेज़ी में)।

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